मुझे कुछ मुफ़्त नहीं मिला / राजेन्द्र सिंह बिष्ट
मुझे कभी कुछ मुफ़्त नहीं मिला, न रोटी, न छत, न कोई सहारा मिला। बचपन भी ज़िम्मेदारियों में बीत गया, खुद से ही जीना सीखा, खुद ही संभाला। चौदह साल की उम्र में बोझ उठाया, खुद को ही...
read more >>आत्म मंथन कर सको तो भूल भी तुमको दिखेगी धुंध जो छाई हटेगी कल्पना के पंख ऐसे,उड़ रहे जिनकी वजह से। सत्यता को भूल बैठे,भटकते अपनी जगह से। कर्म का फल ही मिलेगा,सीख गीता ने...
read more >>लक्ष्य साधा है प्रिये तो अंत तक फिर साथ चलना हाल कैसा भी रहे पर प्रथ से अपने मत विचलना नेह के धागे सुकोमल,रेशमी भावों के मोती। ये समर्पण मांगते हैं,आस की जलती है ज्योति।...
read more >>हाय रे ग़रीबी, तू भी कैसी साया है, छाँव में भी जलाए, धूप में भी सताया है। सपनों को गिरवी रख, क़र्ज़ में सांस लेती, एक घर की चाह में, उम्र सारी दे जाती है।...
read more >>चले थे बड़े गुमां के साथ दिल में हसरत-ए-अरमां लिए तलाश-ए-मजिल की निकल पड़े अन्जां राह पर…. निकल आये बहुत दूर कि दिखाई दी वीराने में धुंध रोशनी सी और धुधंली सी राह…. लेकिन जमाने...
read more >>ज़िंदगी में कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं, जिन्हें बताना नामुमकिन ही नहीं, बल्कि उन्हें छू लेने भर से साँसें भी कांपने लगती हैं। वो ज़ख़्म, जिन्हें हम देख नहीं पाते पर वे हर धड़कन में...
read more >>अब न वह यौवन है, न वह नशा, न वह उन्माद। वह महफिल उठ गई, वह दीपक बुझ गया, जिससे महफिल की रौनक थी। वह प्रेममूर्ति कब्र की गोद में सो रही है। हाँ, उसके...
read more >>सोनजुही में आज एक पीली कली लगी है। इसे देखकर अनायास ही उस छोटे जीव का स्मरण हो आया, जो इस लता की सघन हरीतिमा में छिपकर बैठता था और फिर मेरे निकट पहुंचते ही...
read more >>तुम्हें खोजता था मैं, पा नहीं सका, हवा बन बहीं तुम, जब मैं थका, रुका । मुझे भर लिया तुमने गोद में, कितने चुम्बन दिये, मेरे मानव-मनोविनोद में नैसर्गिकता लिये; सूखे श्रम-सीकर वे छबि के...
read more >>जीवन चिरकालिक क्रन्दन । मेरा अन्तर वज्रकठोर, देना जी भरसक झकझोर, मेरे दुख की गहन अन्ध- तम-निशि न कभी हो भोर, क्या होगी इतनी उज्वलता- इतना वन्दन अभिनन्दन ? हो मेरी प्रार्थना विफल, हृदय-कमल-के जितने...
read more >>जिसके कंधे पर चिंताओं का बोझ बनकर घूमते रहे हम सारे आयु-मार्ग में, जग के विविध गली-कूचे में; चढ़ाव-उतराव में भटकते रहे हम बनकर जिसके सर की परेशानियाँ; ले आए आज हम उस शरीर को...
read more >>नीचे पर्वत थली रम्य रसिकन मन मोहत ऊपर निर्मल चन्द्र नवल आभायुत सोहत कबहुँ दृष्टि सों दुरत छिपत मेघन के आडें अन्धकार अधिकार तुरत निज आय पसारे नवल चंद्रिका छिटकि फेरि सब बनहिं प्रकाशत निर्मल...
read more >>जय जय जग नायक करतार करत नाथ कर जोरि आज हम विनती बारम्बार प्रात समीर सरिस भारत महँ हिन्दी करै प्रसार जय जय जग नायक करतार खोलै परखि उनीदे नयनन दरसावैं संसार बुधा हिय सागर...
read more >>क्यूँ बार-बार हर बार वो ही पुरानी बातें दिल को पागल कर देती हैं. मन को दुखाती बेइंतहा दिल को बोझिल कर देती हैं. समझ में आता नहीं कुछ भी पर मन तो भारी हो...
read more >>कष्ट से उबार दे! संवार दे मां भारती! देह रोष में जले, टले न रण का सवाल, कपाल-भाल पर तिलक रूप रौद्र है विशाल। सजल नयन,व्यथित मन, बह रहे हैं अश्रुधार, रार हैं कई प्रकार...
read more >>बुरी आदतों का चक्रव्यूह वाक़ई बहुत खतरनाक होता है, धीरे-धीरे ये इंसान की सोच, समझ और संतुलन सब पर कब्ज़ा जमा लेता है। यदि समय रहते इन आदतों की लगाम न खींची जाए, तो समझो...
read more >>ज़िंदगी में कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं, जिन्हें बताना नामुमकिन ही नहीं, बल्कि उन्हें छू लेने भर से साँसें भी कांपने लगती हैं। वो ज़ख़्म, जिन्हें हम देख नहीं पाते पर वे हर धड़कन में...
read more >>मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी, मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी। इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग-मलिन उपहास तब भी कहते...
read more >>सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं समाना चाहता है, जो बीन उर में...
read more >>छोटा मोरा खेत चौकोना कागज़ का एक पन्ना, कोई अंधड़ कहीं से आया क्षण का बीज बहाँ बोया गया । कल्पना के रसायनों को पी बीज गल गया नि:शेष; शब्द के अंकुर फूटे, पल्लव-पुष्पों से...
read more >>बदल जायेगा ये जमाना, राहे नेकी पर चलने से तेरे गलतफहमी है तेरी, खुद को समझ और बदल। गर है तू गरीब तो अधिकार नही जीने का, कुछ करने का तुझे। गर है तू ईमानदार...
read more >>दिवसावसान का समय – मेघमय आसमान से उतर रही है वह संध्या-सुन्दरी, परी सी, धीरे, धीरे, धीरे, तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास, मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर, किंतु ज़रा गंभीर, नहीं है उसमें...
read more >>वह तोड़ती पत्थर; देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर— वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन, भर बँधा यौवन, नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन, गुरु हथौड़ा...
read more >>तुम्हें खोजता था मैं, पा नहीं सका, हवा बन बहीं तुम, जब मैं थका, रुका । मुझे भर लिया तुमने गोद में, कितने चुम्बन दिये, मेरे मानव-मनोविनोद में नैसर्गिकता लिये; सूखे श्रम-सीकर वे छबि के...
read more >>जीवन चिरकालिक क्रन्दन । मेरा अन्तर वज्रकठोर, देना जी भरसक झकझोर, मेरे दुख की गहन अन्ध- तम-निशि न कभी हो भोर, क्या होगी इतनी उज्वलता- इतना वन्दन अभिनन्दन ? हो मेरी प्रार्थना विफल, हृदय-कमल-के जितने...
read more >>चले थे बड़े गुमां के साथ दिल में हसरत-ए-अरमां लिए तलाश-ए-मजिल की निकल पड़े अन्जां राह पर…. निकल आये बहुत दूर कि दिखाई दी वीराने में धुंध रोशनी सी और धुधंली सी राह…. लेकिन जमाने...
read more >>हाय रे ग़रीबी, तू भी कैसी साया है, छाँव में भी जलाए, धूप में भी सताया है। सपनों को गिरवी रख, क़र्ज़ में सांस लेती, एक घर की चाह में, उम्र सारी दे जाती है।...
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